चीन को लेकर आंख लाल? लेकिन, स्वदेशी नीति बेहाल!

प्रदीप द्विवेदी

लंबे समय से भारत-चीन सीमा पर धूर्तता दिखा रहे चीन को लेकर देश में काफी गुस्सा है, लेकिन केन्द्र सरकार की दोहरी नीति के कारण चीन के खिलाफ बातें अलग तरह की हैं और काम अलग तरह के हैं। यही वजह है कि चीन को लेकर लाल आंख दिखाने की बार-बार बात तो की जाती, लेकिन हकीकत एकदम अलग है जिसके कारण स्वदेशी नीति बेहाल है।

खबर है कि चीन की एक कंपनी को दिल्ली-मेरठ आरआरटीएस परियोजना में ठेका मिलने पर विवाद हो गया है। कभी दिखावे के लिए वंदेभारत, हाई-वे प्रोजेक्ट जैसी परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को बाहर कर दिया गया था, परन्तु अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम ने दिल्ली-मेरठ आरआरटीएस परियोजना के तहत न्यू अशोक नगर से साहिबाबाद तक 5.6 किलोमीटर के भूमिगत मार्ग के निर्माण का ठेका एक चीनी कंपनी- शंघाई टनल इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड को दिया है।
पीएम मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण लंबे समय से स्वदेशी आंदोलन से जुड़े लोग भी परेशान हैं, किन्तु अब लगता है कि उनका धैर्य भी जवाब देने लगा है।
खबरों पर भरोसा करें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहयोगी संस्था स्वदेशी जागरण मंच ने चीनी कंपनी की बोली को कैंसल करने की मांग की है।
दिलचस्प बात यह है कि इस पर मोदी सरकार का तर्क है कि देश की पहली क्षेत्रीय त्वरित रेल परिवहन प्रणाली को क्रियान्वित करने वाली एनसीआरटीसी ने निर्धारित प्रक्रिया और दिशा-निर्देशों के तहत यह ठेका दिया है।
स्वदेशी आंदोलन के तहत चीनी सामान के बहिष्कार की बात बार-बार की जाती है और 100 रुपए के झालर खरीदने वालों को भी धिक्कारा जाता है, परन्तु चीन की तमाम धूर्तताओं के बावजूद चीनी कंपनी को 1000 करोड़ रुपये का ठेका देना, यह बताता हैं कि सरकार को चेहरा और मुखौटा, दोनों एकदम अलग हैं।
यह भी आश्चर्यजनक बात है कि विपक्ष के विरोध से पहले सरकार को अपनों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
चीन विरोधी स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार से इस ठेके को रद्द करने की मांग की है और कहा है कि इसके बजाय किसी स्वदेशी कंपनी को काम दिया जाए।
यही नहीं, स्वदेशी जागरण मंच का दावा है कि अगर सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाना है तो इसके लिए महत्वपूर्ण परियोजनाओं में चीनी कंपनियों के बोली लगाने पर प्रतिबंध होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि चीन की कंपनी ने इस कार्य के लिए 1126 करोड़ रुपये की सबसे कम बोली लगाई थी, जबकि भारत की टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने कोरिया की कंपनी एसकेईसी के साथ मिलकर बोली लगाई थी, जो 1346 करोड़ रुपये की थी। इसी तरह एलएंडटी को बोली 1170 करोड़ रुपये, गुलरमैक की 1326 करोड़ रुपये और एफ्कॉन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर की बोली 1400 करोड़ रुपये की थी।
बहरहाल, केन्द्र सरकार की मजदूर नीति, व्यापार नीति, कृषि नीति आदि को लेकर विपक्ष तो विरोध कर ही रहा है, परन्तु अब तो सरकार की नीतियों पर सहयोगियों ने ही सवालिया निशान लगाने शुरू कर दिए हैं?
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