श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन

 विश्व हिंदी दिवस 2021 के पावन अवसर पर श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एवं विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 10 जनवरी, 2021 को हिंदी का वैश्विक स्वरूप विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन किया गया| दोपहर 3:00 बजे शुरू हुई यह संगोष्ठी लगभग 4 घंटे चली| इस संगोष्ठी में भाग लेने के लिए लगभग 500 हिंदी प्रेमियों ने अपना पंजीकरण करवाया, जो पूरे भारतवर्ष से ही नहीं, अपितु विदेश से भी थे| इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात व्यंग्यकार एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, भारत सरकार की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका गगनांचल के पूर्व संपादक डॉ. हरीश नवल ने की| मुख्य अतिथि दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर पूरन चंद टंडन जी थे| मुख्य वक्ता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर लारी आजाद थे, जबकि विशिष्ट वक्ता के रूप में मास्को स्टेट लिंग्विस्टिक यूनिवर्सिटी में  एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मैक्सीम डेम्चेंको और विश्व हिंदी सचिवालय के पूर्व कार्यवाहक महासचिव श्री गंगाधर गुलशन सुखलाल थे| कार्यक्रम का सफल एवं प्रभावशाली संचालन श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रवि शर्मा 'मधुप' ने किया और धन्यवाद ज्ञापन ‘गगनांचल’ के संपादक और विश्व हिंदी साहित्य परिषद के अध्यक्ष डॉ. आशीष कंधवे ने दिया|




 कार्यक्रम का प्रारंभ सरस्वती वंदना से हुआ| श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स की प्राचार्या प्रोफेसर सिमरित कौर ने  स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा कि हिंदी विश्व में तेज़ी से आगे बढ़ती हुई भाषा है| इसके प्रचार-प्रसार के लिए हम सभी को लगातार कोशिश करनी चाहिए| हिंदी हमारी मन की भाषा है, इसमें ज्ञान-विज्ञान को सहज रूप से व्यक्त किया जा सकता है क्योंकि यह बहुत वैज्ञानिक भाषा है| बदलते समय के साथ विश्व में व्यापार के लिए लोगों का आना-जाना आसान हुआ है और भारत में व्यापार करने के लिए विदेशी लोगों को भी हिंदी सीखनी पड़ती है| आज इस बात की ज़रूरत है कि हम अपने देश में हिंदी की स्थिति को और मजबूत बनाएँ| उन्होंने उपस्थित विद्वानों से यह अनुरोध भी किया कि वे उच्च अध्ययन के स्तर पर एक वर्ष हिंदी को अनिवार्य रूप से पढ़ाने के लिए सरकार को पत्र लिखें| श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स द्वारा हिंदी में इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय हिंदी की संगोष्ठी के आयोजन को ऐतिहासिक बताते हुए उन्होंने आयोजक डॉ रवि शर्मा ‘मधुप’ और डॉ. आशीष कंधवे को शुभकामनाएँ दी|

 डॉ. आशीष कंधवे ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए विश्व में हिंदी की चमक-दमक और भविष्य की संभावनाओं का चित्र खींचा| विभिन्न देशों में हिंदी किस प्रकार लोकप्रिय हो रही है, हिंदी के शब्द अंग्रेज़ी शब्दकोश में स्थान पा रहे हैं, हिंदी भाषी विश्व राजनीति में अपनी पैठ बना रहे हैं, इन सभी बिंदुओं को प्रस्तुत किया|

मुख्य अतिथि प्रोफ़ेसर पूरन चंद टंडन ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी की उपयोगिता और महत्त्व को रेखांकित किया| हिंदी में रोज़गार के नए क्षेत्रों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने मीडिया, अनुवाद, पर्यटन आदि से उदाहरण  भी दिए| हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में जिन भारतीय और विदेशी विद्वानों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, जिन संस्थाओं ने इस कार्य को आगे बढ़ाया, उन सबका संक्षिप्त उल्लेख प्रोफेसर टंडन ने अपने उद्बोधन में किया|

 मुख्य वक्ता प्रोफेसर लारी आजाद ने विभिन्न ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर यह सिद्ध किया कि हिंदी आज से नहीं, अपितु सैकड़ों सालों से वृहत्तर भारत,  जिसमें जावा, सुमात्रा, बाली, चंपा, श्याम, सिंहल द्वीप आदि शामिल थे, संपर्क भाषा की भूमिका निभाती आ रही है| हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, अपितु सांस्कृतिक सेतु है| उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर बताया कि जिन देशों में भी वे गए, वहाँ भारतीय होने और हिंदी भाषी होने के कारण उन्हें बहुत सम्मान और यश प्राप्त हुआ| उनके वक्तव्य का सार था - हिंदी में भारत की समग्र सांस्कृतिक अवधारणा अभिव्यक्त होती है|

 इस संगोष्ठी को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने वाले रूस के विद्वान डॉ. मैक्सीम डेम्चेंको ने बताया कि बचपन में उन्होंने रूसी विद्वान वारान्निकोव द्वारा रामचरितमानस का रूसी में किया गया अनुवाद पढ़ा था, तभी से उनके मन में भारत और भारतीय संस्कृति के संबंध में उत्सुकता जागी थी| इसी के परिणाम स्वरूप उन्होंने 2011 में रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ह्यूमेनिटी से भारतीय अध्ययन के संदर्भ में सांस्कृतिक अध्ययन में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की| डॉ. मैक्सीम को भारत ने इतना आकर्षित किया कि वे अनेक बार भारत की यात्रा कर चुके हैं और अयोध्या, वाराणसी आदि में रहकर राम रसिक संप्रदाय, कबीर, गुरु नानक देव, वैष्णव भक्ति आदि का अध्ययन करते हैं| उन्होंने हिंदी और अवधी में लिखी अपनी कविताएँ सुनाकर सभी श्रोताओं का मन मोह लिया|

दूसरे विशिष्ट वक्ता श्री गंगाधर सिंह गुलशन सुखलाल ने मॉरीशस में हिंदी की विकास यात्रा और विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा हिंदी के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए किए गए कार्यों को पॉवर पॉइंट प्रस्तुति के माध्यम से अत्यंत सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया| प्रवासी हिंदी साहित्य में मॉरीशस के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने अनेक उदाहरण देकर  मॉरीशस में हिंदी द्वारा निभाई जा रही विभिन्न भूमिकाओं को भी स्पष्ट किया| विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा हिंदी के वैश्विक स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उन्होंने वर्तमान दौर में आने वाली चुनौतियों, नई संभावनाओं और नए प्रश्नों को व्यक्त किया|

 हिंदी के प्रखर व्यंग्यकार एवं वक्ता डॉ. हरीश नवल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन से संगोष्ठी को चरम उत्कर्ष पर पहुँचा दिया| उन्होंने विविध देशों में अपने अनुभवों के आधार पर हिंदी का व्यावहारिक-वैश्विक स्वरूप स्पष्ट किया| किस तरह से अनेक देशों में अंग्रेजी का प्रयोग ना होने के कारण हिंदी की सहायता से संपर्क और संवाद हो पाया, इसके उदाहरण उन्होंने दिए| डॉ. नवल ने हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाने की बजाए उसे सहज बोलचाल के रूप में विकसित होने देने पर जोर दिया| हिंदी के संदर्भ में उन्होंने पूर्व और पश्चिम में जो भी श्रेष्ठ है, उपयोगी है और प्रासंगिक है; उसे अपनाने का सुझाव दिया| हिंदी के विकास में हिंदी सिनेमा और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका का भी उन्होंने उल्लेख किया और सभी वक्ताओं के वक्तव्य पर सटीक-सार्थक टिप्पणी भी की|

संगोष्ठी के अंतिम चरण में प्रतिभागियों की प्रतिक्रियाएँ और प्रश्न आमंत्रित किए गए, जिसमें उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया| अंत में, डॉ. आशीष कंधवे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया| संगोष्ठी के संचालक डॉ. रवि शर्मा 'मधुप’ ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कुशल प्रस्तुति से पूरी संगोष्ठी को सरस और सुगठित बनाए रखा|
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