ग़ज़ल


अब हक़ीक़त से नज़र हटने लगी है
ख़्वाब की चिड़िया बहुत उड़ने लगी है


इस क़दर निस्बत कभी मैंने न की थी
हाथ से हर चीज़ क्यों छिनने लगी है


रात के दूजे पहर में जाने जाना
चाँदनी भी शूल सी चुभने लगी है


आबलों की देख कर हिम्मत सितमगर
राह सीधी राह पर चलने लगी है


जब दिलों से मिट गईं सब दूरियाँ तो
प्रेम की गंगा सहज बहने लगी है


 


-बलजीत सिंह बेनाम



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